ऐसे लोग जो इंसानियत की मिसाल होते हैं ।
आज इस दौर में कि जहाँ हर तरफ़ अफ़रा तफ़री मची है,
यतीमों और बेसहारों का हक़ खा जाने का माहौल गर्म है,
किसी की ज़रा सी मदद कर देने पर कुछ लोगों की दिली ख्वाहिश ये होती है कि उस मजबूर आदमी के साथ मदद करते हुए इनकी तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो जाय या इस मदद का प्रचार हो जाय और लोग खूब तारीफ़ करें कि फलाँ साहब ने फलाँ साहब की मदद की,
कितना अज़ीम काम अंजाम दिया ,
और कुन्द ज़ेहनियत के उन जैसा मिज़ाज रखने वाले लोग उनके चाहने वाले
ऐसे शोहरत पसंद लोगों की सोशल मीडिया पर ऐसी तारीफें करते हैं कि जैसे वो कोई फरिश्ता हों,
लोगों को ऐसा महसूस कराने की कोशिश करते हैं कि इन जनाब ने जो काम कर दिया, जो मदद कर दी वो सलाहियत इनके अलावा किसी और के पास तो है ही नहीं,
लफ्फाज़ियों की एक लंबी फ़ेहरिस्त है इन लोगों के पास,
आप ऐसे लोगों को अँध भक्त भी कह सकते हैं,
ऐसे लोगों से शरीफ़ हज़रात उसी तरह खुद को बचाते हैं जिस तरह बरसात में खुद को कीचड़ से बचाते हैं,
और ऐसे लोगों से शरीफों को दूरी बना कर रखना भी चाहिए,
इन्हें जो आईना दिखा दे ये उनके दुश्मन हो जाते है,
इसलिये कि ऐसे लोग बहुत सारी गलत फहमियां पाले हुए होते हैं,
जैसे कि इनसे बड़ा कोई आलिम नहीं,
दुनिया में जिन लोगों को ये पसंद करें,
चाहे जैसे भी कम'ज़र्फ़ लोगों को ये पसंद करें,
जिन ओलामा को ये पसंद करें,
बस वोही लायक़े तज़ीम हैं बाक़ी बचे लोगों की इनके आगे तो कोई औक़ात नहीं है,
इनसे बड़ा कोई दानी नहीं,
इनसे ज़्यादा कोई ताक़तवर नहीं,
इनसे बड़ा कोई मुत्तक़ी और परहेज़गार नहीं,
जन्नत और जहन्नुम में ये जिसे चाहें भेज दें,
पल भर में किसी इंसान को ज़लील'ओ'रूसवा कर दें,
ऐसे लोग फ़ानी दौलत'ओ शोहरत, झूठी शान के अलावा किसी के सगे नहीं होते हैं,
यानी कि बस ऐसे लोगों ने खुदाई का दावा अभी तक नहीं किया है,
मगर समझते ये हैं कि ज़मीन पर वोही खुदा हैं जिनके एख्तेयार में कुल कायनात है,
ऐसे लोग दरअसल खुदा को भूल बैठे हैं,
ऐसे लोग चाहे खुद को कितना भी अच्छा साबित करने की कोशिश करें,
न तो ऐसे लोग खुदा पहचानते हैं न मानते हैं,
दर'असल ऐसे लोग शैतान की परस्तिश करने वाले होते हैं,
समझ में नहीं आता किस पर भरोसा किया जाय किस पर नहीं,
ऐसे गलीज़ और पलीद माहौल में भी इंसानियत की मिसाल कहे जाने वाले कुछ लोग हैं जो खुदा को पहचानते हैं, खुदा से डरते हैं,
बहुत कम हैं ऐसे लोग !
मगर हैं,
और मुझे फ़ख्र है ऐसे लोगों पर मैं खुद को खुशक़िस्मत समझता हूँ कि मैं चंद ऐसे लोगों को जानता हूँ पहचानता हूँ जिनके सामने अगर किसी की मजबूरी और बेबसी की बात की जाय या उन्हें पता चले कि फलाँ इंसान मजबूर है भूखा है परेशान है तो वो उसकी मदद करने के लिए बेचैन हो जाते हैं,
बिना इस बात की परवाह किये कि वो कौन है ?
कहाँ रहता है ?
बल्कि उनकी इंसानियत की इन्तेहा ये है कि वो खुद को ज़ाहिर भी नहीं होने देते, और अपनी सलाहियत के मुताबिक़ जहां तक भी मुमकिन होता है मदद करते हैं ,
मैं सलाम करता हूँ ऐसे लोगों को
तहे दिल इज़्ज़त करता हूँ ऐसे लोगों की जो अपने वजूद में खौफे खुदा रखते हैं,
और लानत भेजता हूँ ऐसे लोगों पर कि
जो खुदा की खुशनूदी की खातिर नहीं बल्कि
सिर्फ़ नामो नुमूद के लिए जी रहे हैं ।
- वस्सलाम
- परवेज़ अली

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